भारत में मत्स्यपालन की कहानी निरंतर विकास की कहानी है – अधिक उत्पादन, व्यापक भागीदारी और मजबूत बाजार संबंध। लेकिन जो कारक विकास को गति देते हैं, वही जोखिम को भी बढ़ाते हैं। रोग, बाढ़ और जलवायु परिवर्तनशीलता मत्स्यपालन की पूरी फसल चक्र को बाधित कर सकते हैं और किसानों पर गंभीर आर्थिक दबाव डाल सकते हैं। पीएम – एमकेएसएसवाई की मत्स्यपालन बीमा पहल जोखिम कवरेज के एक संरचित ढांचे के माध्यम से इस वास्तविकता का समाधान करती है। इसके व्यापक कार्यान्वयन के लिए, पारदर्शिता, त्वरित प्रतिक्रिया और समय पर निपटान के माध्यम से किसानों और बीमाकर्ताओं के बीच विश्वास का निर्माण करना आवश्यक है।
वैश्विक मत्स्य पालन और जलीय कृषि उत्पादन 2024 में रिकॉर्ड 235 मिलियन टन तक पहुंच गया, जिसमें 195 मिलियन टन जलीय जीव शामिल थे। इस क्षेत्र का अनुमानित प्रथम-विक्रय मूल्य 565 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जबकि जलीय उत्पादों का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 186 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। जलीय कृषि ने वैश्विक जलीय खाद्य प्रणालियों में वृद्धि को गति देना जारी रखा, जबकि मछली पकड़ने का उत्पादन लगभग 92 मिलियन टन पर स्थिर रहा। अंतर्देशीय मत्स्य पालन ने भी 12.3 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया, जो विश्व स्तर पर खाद्य सुरक्षा और आजीविका के लिए इसके बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
इस वैश्विक परिदृश्य में भारत का योगदान महत्वपूर्ण है और अभी भी इसका विस्तार जारी है। 2024-25 में मछली उत्पादन के रिकॉर्ड 19.8 मिलियन टन तक पहुँचने के साथ, भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है (लगभग 8% हिस्सेदारी)। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जलीय कृषि, जिसमें मीठे पानी की कार्प मछलियों का तालाबों में पालन, खारे पानी के झींगे और प्रॉन्स का पालन, पिंजरा पालन और ठंडे पानी और समुद्री प्रजातियों की बढ़ती हुई श्रृंखला शामिल है, अब भारत के कुल मछली उत्पादन का लगभग 74% हिस्सा है।
भारत का कुल मछली उत्पादन 2013-14 में 9.6 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 19.8 मिलियन टन हो गया, जबकि अंतर्देशीय उत्पादन 2013-14 में 6.1 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 14.74 मिलियन टन तक पहुंच गया। यह एक ऐसा परिवर्तन है जिसकी बराबरी कुछ ही क्षेत्र कर सकते हैं। निर्यात की कहानी भी उतनी ही प्रभावशाली है। भारत समुद्री भोजन के विश्व के अग्रणी निर्यातकों में से एक है, जिसमें अकेले जमे हुए झींगे का हिस्सा कुल समुद्री भोजन निर्यात आय का लगभग 66% है। पिछले दशक में भारत के समुद्री उत्पाद निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2013-14 में 5.08 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 8.46 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, जो वैश्विक बाजारों में इस क्षेत्र की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाता है। 2025-26 में, भारत ने विश्व भर के बाजारों में 8.46 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के समुद्री भोजन का निर्यात किया।
मत्स्य पालन क्षेत्र 3 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है, जिनमें मछुआरे, मछली पालक, व्यापारी, प्रसंस्करणकर्ता और परिवहनकर्ता शामिल हैं। इनमें से अधिकांश भारत के तटीय, आदिवासी और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों से आते हैं। एक ऐसे देश में जहां कृषि संकट एक निरंतर चुनौती बना हुआ है, मत्स्य पालन क्षेत्र अपने जलीय कृषि उत्पादन के नेतृत्व में ग्रामीण आर्थिक गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण चालक रहा है।
भारत के मत्स्यपालन क्षेत्र में हाल के वर्षों में हुई निरंतर प्रगति के कारण उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, और इसमें अभी भी विस्तार की गुंजाइश है। देश में 1.95 लाख किलोमीटर नदियाँ और नहरें, 31.5 लाख हेक्टेयर जलाशय, 22.1 लाख हेक्टेयर तालाब और तालाब तथा 14.1 लाख हेक्टेयर खारे पानी का क्षेत्र है, जिनमें से केवल लगभग 17% क्षेत्र ही मत्स्यपालन के लिए विकसित किया गया है। मछली उत्पादन 2013-14 में 9.6 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 19.8 मिलियन टन हो गया है, जो 106% से अधिक की वृद्धि है। मत्स्यपालन की औसत उत्पादकता बढ़कर 4.77 टन प्रति हेक्टेयर हो गई है, जबकि सरकार का लक्ष्य पीएमएमएसवाई के तहत 5 टन प्रति हेक्टेयर है। यह एक ऐसा बाजार है जिसमें अपार संभावनाएं मौजूद हैं और वर्तमान में इसकी वृद्धि दर तेजी से बढ़ रही है। इतने बड़े बाजार में वित्तीय जोखिम भी शामिल है जिसे कोई भी किसान अकेले वहन नहीं कर सकता।
मत्स्य पालन उत्पादन में नए फार्मों के विस्तार के माध्यम से क्षैतिज रूप से और मौजूदा फार्मों के गहन विकास के माध्यम से ऊर्ध्वाधर रूप से वृद्धि होने के साथ, यह क्षेत्र कई जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। बीमारियों का प्रकोप, गर्मी के मौसम में मछलियों की मृत्यु जैसी अपरिहार्य आपदाएँ, प्रदूषण, भूकंप, चक्रवात, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ बार-बार होने वाले जोखिम पैदा करती हैं जो महीनों के निवेश को बर्बाद कर सकती हैं।
इन जोखिमों का छोटे और सीमांत किसानों पर संचयी वित्तीय प्रभाव गंभीर है। इनमें से अधिकांश किसान कम मुनाफे पर खेती करते हैं और उच्च ब्याज दरों पर अनौपचारिक ऋण से अपना खर्च चलाते हैं। एक फसल का खराब होना न केवल किसान को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि इससे कर्ज का ऐसा दुष्चक्र शुरू हो सकता है जिससे उबरने में वर्षों लग जाते हैं, और शायद कभी उबर भी न पाएं। इन व्यक्तिगत नुकसानों का संचय इस क्षेत्र की विकास क्षमता को सीमित करता है, निवेश को हतोत्साहित करता है और उन किसानों की महत्वाकांक्षाओं को संकुचित करता है जो अन्यथा विस्तार कर सकते थे। इसलिए, जोखिम कम करने का आर्थिक तर्क केवल किसान कल्याण का मामला नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय उत्पादकता और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का भी मामला है।
उपलब्ध जोखिम प्रबंधन साधनों में बीमा का एक विशेष स्थान है। यह नुकसान को रोकता तो नहीं है, लेकिन किसानों को आर्थिक संकट से बचाता है, जिससे उनकी सहनशीलता और उत्पादन जारी रखने की क्षमता मजबूत होती है। इसे ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने 8 फरवरी 2024 को प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) को मंजूरी दी। इस उप-योजना के घटक 1-बी के तहत मत्स्य पालन बीमा अपनाने को प्रोत्साहन देने की परिकल्पना की गई है। इसका वितरण राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म (एनएफडीपी) के माध्यम से किया जाता है, जिससे डीबीटी के माध्यम से किसानों तक सीधे लाभ पहुंचता है।
पीएम-एमकेएसएसवाई के तहत, मत्स्यपालन बीमा सामर्थ्य की मुख्य बाधा को दूर करता है, जिसमें मत्स्यपालन किसानों को एक फसल चक्र के लिए डीबीटी के माध्यम से मत्स्यपालन बीमा पॉलिसी खरीदने पर एकमुश्त मौद्रिक प्रोत्साहन दिया जाता है। इस योजना के तहत, पात्र लाभार्थियों को बीमा प्रीमियम लागत का 40% तक प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है। तालाब आधारित मत्स्यपालन के लिए, प्रोत्साहन ₹25,000 प्रति हेक्टेयर जल क्षेत्र तक सीमित है, जो 4 हेक्टेयर तक के लिए अधिकतम ₹1,00,000 के प्रोत्साहन के अधीन है, जबकि एक हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले फार्म आनुपातिक आधार पर पात्र हैं। उन्नत मत्स्यपालन प्रणालियों जैसे कि केज कल्चर, रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस), बायो फ्लोक, रेसवे और इसी तरह की तकनीकों के लिए, बीमा प्रीमियम का 40% प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है, जिसमें अधिकतम प्रोत्साहन ₹1,00,000 और अधिकतम पात्र इकाई का आकार 1,800 घन मीटर है। इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और महिला लाभार्थी सामान्य श्रेणी के लिए देय प्रोत्साहन राशि के 10% की दर से अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि के लिए पात्र हैं।
दावा निपटान के संदर्भ में, बीमित जोखिम की घटना होने पर, लाभार्थी को दावा प्रक्रिया शुरू करने के लिए तुरंत बीमा कंपनी को सूचित करना होगा। बीमित व्यक्ति को पॉलिसी की शर्तों के अनुसार दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे, जिसके बाद बीमा कंपनी नुकसान का आकलन करने के लिए एक हानि मूल्यांकनकर्ता नियुक्त करती है। मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर, दावे पर कार्रवाई की जाती है और बीमित व्यक्ति को भुगतान किया जाता है, साथ ही बीमाकर्ता के पोर्टल के माध्यम से समय-समय पर स्थिति की जानकारी भी दी जाती है। झींगा पालन के लिए संपूर्ण दावा निपटान प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर और अन्य जलीय कृषि गतिविधियों के लिए 45 दिनों के भीतर पूरी की जानी है।
वर्तमान में चार बीमाकर्ता कार्यरत हैं: ओआईसीएल, एआईसीएल, एनआईएएल और यूआईआईसी, जो झींगा/प्रॉन, मीठे पानी की मछली और ठंडे पानी की प्रजातियों के लिए कवरेज प्रदान करते हैं, और बीमा तंत्र को मजबूत करने के लिए निजी बीमाकर्ताओं को भी शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है।
इस योजना के अंतर्गत एकमुश्त प्रोत्साहन (ओटीआई) घटक के कार्यान्वयन में भी उत्साहजनक प्रगति देखी गई है। अब तक कुल 316 ओटीआई आवेदन प्राप्त हुए हैं, जो 730.61 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं। इनमें से 127 आवेदनों को मंजूरी देकर किसानों को राशि वितरित की जा चुकी है, जिससे 321.74 हेक्टेयर क्षेत्र के किसानों को लाभ हुआ है और कुल ₹40.03 लाख का वितरण किया गया है। मत्स्य पालन बीमा का पूरा लाभ तभी मिलेगा जब किसानों और बीमा कंपनियों के बीच यह विश्वास मजबूत होगा कि दावों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाएगा और अनावश्यक देरी के बिना उनका निपटारा किया जाएगा। अब आवश्यक है कि दावा निपटान में निरंतर सुधार हो, सत्यापन के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाए और समय पर समाधान किया जाए, ताकि किसान बीमा को केवल कागजी कार्रवाई न समझें, बल्कि नुकसान के समय एक विश्वसनीय सुरक्षा के रूप में अनुभव करें।
सरकार का उद्देश्य केवल प्रीमियम पर सब्सिडी देना ही नहीं है; बल्कि मत्स्यपालन बीमा के लिए एक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बाज़ार का निर्माण करना है। इसके लिए सभी हितधारकों के बीच एक सुसंगत और सहयोगात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी: केंद्र सरकार नीतिगत दिशा-निर्देश और डिजिटल ढांचा प्रदान करे, राज्य सरकारें पहुंच और जमीनी स्तर पर सहायता प्रदान करें, बीमा कंपनियां विश्वसनीय उत्पाद तैयार करें और उनकी सेवाएं प्रदान करें, किसान कृषि प्रबंधन के हिस्से के रूप में जोखिम सुरक्षा को अपनाएं, और तकनीकी संस्थान जोखिम मूल्यांकन, निगरानी और हानि सत्यापन को मजबूत करें। पीएम-एमकेएसएसवाई स्वयं यह परिकल्पना करता है कि ये हस्तक्षेप समय के साथ मत्स्यपालन बीमा उत्पादों के लिए एक मजबूत बाज़ार बनाने में मदद करेंगे। ऐसा बाज़ार तभी टिकाऊ बनेगा जब सभी हितधारक मत्स्यपालन से जुड़े जोखिमों को व्यावहारिक, उत्तरदायी और समन्वित तरीके से संबोधित करने के लिए मिलकर काम करेंगे। जब ऐसा होगा, तो बीमा एक सहायक हस्तक्षेप होने के बजाय एक लचीली मत्स्यपालन अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन जाएगा।

