देश में कोयला ब्लॉक आवंटन की प्रक्रिया में पिछले एक दशक के दौरान काफी बदलाव हुए हैं। वर्ष 2014 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने 204 कोयला ब्लॉकों को रद्द कर दिया, तब से यह प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और नियम-आधारित हो गई है। 18 जून 2020 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी की शुरुआत ने इस दिशा में एक अहम कदम उठाया। छह वर्षों के भीतर, यह कदम खनन क्षेत्र में सबसे प्रमुख संरचनात्मक सुधारों में से एक बन गया है, जो उद्योग, सरकारी खजाने और कोयला उत्पादक समुदायों को पारदर्शी तरीके से लाभ पहुंचा रहा है।
इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शिता के साथ संचालित किया गया है। बोली प्रक्रिया एमएसटीसी प्लेटफॉर्म पर दो चरणों में ऑनलाइन होती है, जहां बोली दस्तावेजों को डिक्रिप्ट करके इसे लाइव तरीके से बोलीदाताओं के सामने प्रस्तुत किया जाता है। अंतिम उपयोग पर कोई प्रतिबंध नहीं है, स्वचालित मार्ग से 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है और अग्रिम भुगतान कम रखा गया है जिसे भविष्य के राजस्व हिस्से के आधार पर समायोजित किया जा सकता है। इससे छोटे और नए खिलाड़ियों के लिए भी अवसर खुले रहते हैं। यह नीति इतनी सफल रही है कि अब तक 147 कोयला खदानों की नीलामी हो चुकी है, जिनमें से 44 नई कंपनियों ने कोयला खदानें जीती हैं। इस नीति ने न केवल निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों को लुभाया है, बल्कि पारंपरिक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भी प्रेरित किया है। उदाहरण के तौर पर, कोल इंडिया की सहायक कंपनियां, वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (डब्ल्यूसीएल) और नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल), जो पहले मुख्यतः कोयले का उत्पादन और बिक्री करती थीं, अब हाल के समय में ब्लॉक के लिए निविदाओं में हिस्सा ले रही हैं। ये कंपनियां निजी खिलाड़ियों के समान शर्तों पर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं।
नीलाम किए गए प्रत्येक ब्लॉक से राज्यों को राजस्व हिस्सेदारी (प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से प्राप्त राजस्व हिस्सेदारी, रॉयल्टी के अतिरिक्त), रॉयल्टी (राज्य को मिलने वाली वैधानिक राशि), डीएमएफ अंशदान (पीएमकेकेकेवाई के माध्यम से खनन जिले में पुनः निवेशित), एनएमईटी अंशदान (भविष्य के अन्वेषण के लिए वित्तपोषण) और जीएसटी के रूप में एक मजबूत हिस्सा प्राप्त होता है। 2020 से अब तक नौ राज्यों में 147 कोयला ब्लॉकों की नीलामी की जा चुकी है, जिनसे लगभग 47,500 करोड़ रुपए का वार्षिक राजस्व, 55,000 करोड़ रुपए का पूंजी निवेश और 4.9 लाख रोजगार सृजित होने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2025-26 में, आवंटित वाणिज्यिक खदानों से कुल राजस्व (अग्रिम और प्रीमियम भुगतान से) लगभग 3090 करोड़ रुपए था।
राजस्व के साथ-साथ उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। केवल वाणिज्यिक खदानों से कोयले का उत्पादन वित्त वर्ष 2023-24 में 12.55 मिलियन टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 23.51 मिलियन टन हो गया। कैप्टिव और वाणिज्यिक ब्लॉकों से संयुक्त रूप से वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 210 मिलियन टन का उत्पादन हुआ, जो पहली बार 200 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गया। एक दशक पहले यह आंकड़ा 28.8 मिलियन टन था। इस तरह से इस अवधि के दौरान लगभग 22 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। घरेलू स्तर पर खनन किया गया प्रत्येक अतिरिक्त टन कोयला एक टन आयात की आवश्यकता को कम करता है, जिससे कोयले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के भारत के प्रयासों को सीधे तौर पर मजबूती मिलती है।
पारदर्शी, प्रौद्योगिकी-आधारित बोली प्रक्रिया नए प्रतिभागियों को निरंतर आकर्षित करती है और एक समान अवसर प्रदान करती है, जिससे सरकारी खनिक भी अब ब्लॉक हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसके साथ ही, राजस्व-साझाकरण प्रणाली (जिसमें रॉयल्टी, प्रीमियम, डीएमएफ और एनएमईटी शामिल हैं) ने एक दशक में राज्यों के कोयला राजस्व को लगभग तीन गुना कर दिया है। ये सभी मिलकर वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी प्रणाली को राज्यों, उद्योग, स्थानीय समुदायों और समग्र रूप से राष्ट्र की ऊर्जा सुरक्षा के लिए दूरगामी लाभ प्रदान करने वाली पहल बनाते हैं।









