“हमारी सांख्यिकी संरचना हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाओं जितनी ही आधुनिक और महत्वाकांक्षी होनी चाहिए”: डॉ. पी.के. मिश्रा।
“हमारे आंकड़ों की गुणवत्ता हमारे निर्णयों और विकास परिणामों की गुणवत्ता को प्रभावित करती है”: प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव।
“सांख्यिकी केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति है”: डॉ. पी.के. मिश्रा।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत विश्लेषण आधिकारिक सांख्यिकी को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन सांख्यिकी की गुणवत्ता का विकल्प नहीं बन सकते: डॉ. पी.के. मिश्रा।
डॉ. पी.के. मिश्रा ने MoSPI द्वारा आयोजित राज्य योजना, वित्त और सूचना प्रौद्योगिकी सचिवों के सम्मेलन में मुख्य भाषण दिया।
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने आज नई दिल्ली में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा आयोजित राज्य योजना, वित्त और सूचना प्रौद्योगिकी सचिवों के सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य भाषण दिया। विश्वसनीय आंकड़ों, डेटा सामंजस्य और प्रौद्योगिकी-आधारित शासन के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक मजबूत सांख्यिकी प्रणाली आवश्यक है।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि सांख्यिकी, डेटा, प्रौद्योगिकी, योजना और शासन भारत के विकास पथ के परस्पर जुड़े हुए तत्व हैं। उन्होंने कहा कि एक सुदृढ़ सांख्यिकी प्रणाली सरकारों को राज्यों और जिलों में विकास की प्रगति को मापने, नीतिगत परिणामों का आकलन करने, कमियों की पहचान करने और यह सुनिश्चित करने में सक्षम बनाएगी कि सार्वजनिक संसाधन इच्छित परिणाम प्रदान करें। उन्होंने कहा, “जिस चीज को मापा नहीं जा सकता, उसका प्रभावी प्रबंधन नहीं किया जा सकता। और जिसका प्रभावी प्रबंधन नहीं किया जा सकता, उसे स्थायी रूप से परिवर्तित नहीं किया जा सकता।”
आर्थिक मापन को आधुनिक बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि भारत की सांख्यिकीय प्रणालियों को तेजी से डिजिटल, औपचारिक और परस्पर जुड़ी अर्थव्यवस्था के साथ विकसित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि 2022-23 को आधार वर्ष मानकर नई राष्ट्रीय लेखा श्रृंखला की शुरुआत, साथ ही अद्यतन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) श्रृंखलाओं का कार्यान्वयन, सांख्यिकीय पद्धतियों को बदलती आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
राज्य सांख्यिकी प्रणालियों के महत्व पर जोर देते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि भारत की विकास गाथा मूल रूप से उसके राज्यों की गाथा है, जहां नीतियां लागू होती हैं, आर्थिक गतिविधियां होती हैं और नागरिक विकास के परिणामों का अनुभव करते हैं। उन्होंने आधिकारिक आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार के लिए मजबूत संस्थागत क्षमता और केंद्र-राज्य समन्वय को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, भू-स्थानिक प्रणालियाँ, उपग्रह चित्र और उन्नत विश्लेषण आधिकारिक आँकड़ों की समयबद्धता, सटीकता और उपयोगिता में सुधार के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीकी प्रगति सांख्यिकीय गुणवत्ता, पारदर्शिता, गोपनीयता, सुरक्षा और जवाबदेही द्वारा निर्देशित होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “गति सटीकता की कीमत पर नहीं आ सकती। डेटा का अधिक उपयोग गोपनीयता की कीमत पर नहीं हो सकता।”
डॉ. मिश्रा ने सांख्यिकी को सहकारी संघवाद का एक महत्वपूर्ण साधन बताया, जो राज्यों और केंद्र को परिणामों की तुलना करने, सर्वोत्तम प्रथाओं की पहचान करने और क्षेत्रीय भिन्नताओं से सीखने में सक्षम बनाता है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है, केवल राष्ट्रीय औसत ही पर्याप्त नहीं होंगे; विकास संबंधी कमियों की पहचान करने और हस्तक्षेपों को निर्देशित करने के लिए राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर विस्तृत आंकड़ों की आवश्यकता बढ़ती जाएगी।
अंत में, डॉ. मिश्रा ने सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI), राज्य सांख्यिकी कार्यालयों, वित्त, योजना और सूचना प्रौद्योगिकी विभागों, नीति आयोग, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य हितधारकों को शामिल करते हुए एक सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत को एक ऐसी सांख्यिकीय संरचना की आवश्यकता है जो विश्वसनीय, पारदर्शी, प्रौद्योगिकी-सक्षम, अंतरसंचालनीय और नीति-प्रासंगिक हो। उन्होंने आगे कहा कि ऐसी प्रणाली न केवल भारत के विकास को मापेगी बल्कि 2047 तक विकसित भारत की दिशा में मार्गदर्शन और गति प्रदान करने में भी सहायक होगी।

