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हवा की आवाज़

हवा की आवाज़

दिसम्बर की एक बेहद सर्द शाम, वक़्त क़रीब 5.00 बजे का रहा होगा। मैं बाराबंकी से वापस लखनऊ लौट रहा था। सरसराती हवा मेरी जैकेट और ग्लव्ज को भेद कर हड्डियों में समा रही थी। एकाएक मुझे हवा में तैरती हुई सी एक दर्द भरी आवाज़ सुनाई दी, “कोई मुझे बचाओ, मुझे बचा लो”. मैंने अपनी बाइक को रोक दिया लेकिन मुझे कहीं कोई व्यक्ति दिखाई न दिया। मुझसे काफ़ी आगे जाती हुई एक बस दिखाई दे रही थी। मैंने चारों तरफ़ खोजपूर्ण निगाह दौड़ाई लेकिन जब कोई दिखाई न दिया तो आवाज़ को अपना वहम समझ कर मैंने बाइक को गेयर में डाला। तभी ठीक वैसी ही पुकार मुझे फिर से सुनाई दी। अब मैंने देखा तो थोड़ा आगे एक पगडंडी सड़क से बांई ओर मुड़ रही थी जिसके दोनों ओर सरपत की झाड़ियां थीं। मुझे लगा कि यह आवाज़ उधर से ही आ रही है तो बाइक को लॉक कर के मैं पैदल ही उधर बढ़ लिया।
दोनों तरफ़ की झाड़ियों में झाँकते और ‘कौन है, कौन है?’ की आवाज़ लगाते हुए मैं बढ़ता गया। न तो कोई दिख रहा था न ही कोई जवाब दे रहा था। तेज़ हवा में लहराती सरपत भयावह संगीत पैदा कर रही थी लेकिन मैं सस्पेंस और अपनी आदत का मारा आगे बढ़ता जा रहा था। करीब 100 कदम चल कर दाहिनी तरफ़ एक बहुत पतली सी पगडंडी मुझे दिखी। उसे छोड़ कर मैं सीधे बढ़ा ही था कि फिर वही आवाज़ आई और इस बार वह स्पष्ट रूप से इस पतली पगडंडी की ओर से आती सुनाई दी। मैंने सामने पड़ी एक टहनी उठा ली और पतली पगडंडी की झाड़ियों को किनारे करता हुआ आगे बढ़ा। थोड़ा सा आगे बढ़ने पर मुझे एक अजीब दृश्य दिखा।
एक बड़ा मैदान जिसमें लोहे के दो फाटक लगे हुए थे, मुझे दिखा। ताज्जुब की बात यह थी कि यह दोनों फाटक अगल बगल लगे थे और कोई भी चारदीवारी नहीं थी। दो फाटक एक साथ क्यों लगे हैं, यह मेरी समझ से बाहर था। मैंने फिर आवाज़ देनी शुरू की, “कौन है भाई, क्या तकलीफ़ है, हो कहां तुम ?” कोई जवाब नहीं आया तो मैंने आगे जाकर उस खम्बे पर टेक लगा ली जिससे फाटक लगा हुआ था। घोर आश्चर्य, जैसे ही मैंने उस खम्बे पर टेक लगाई, मुझे आवाज़ सुनाई दी, “मुझे बचाओ, मेरा दम घुट रहा है।” मैं चिहुंक कर खम्बे से अलग हो गया और उसे ध्यान से देखने लगा कि आख़िर खम्बे में से यह आवाज़ कैसे आ सकती है. अभी मैं सोच ही रहा था कि यह कैसी माया है, तब तक वही आवाज़ मुझे हवा में गूंजती हुई सी सुनाई दी. ऐसा लग रहा था जैसे यह आवाज़ वातावरण में गूंज रही है. मैं आगे बढ़ता चला गया. उस सूने से मैदान में, जो पता नहीं किसकी प्रॉपर्टी था कि बिना किसी चारदीवारी के दो-दो फाटक लगे हुए थे, मुझे अजीब सा अनुभव होने लगा. ज्यों ज्यों मैं आगे बढ़ता जा रहा था, त्यों त्यों वह आवाज़ और दूर से आती हुई सुनाई दे रही थी. अब इस आवाज़ में और भी आवाज़ें मिलने लगी थीं जैसे ‘आज तुझे मार ही डालूंगा’, ‘अब तुझे कौन बचा पायेगा’. ‘भूल गया वह दिन जब तूने मेरा गला काट डाला था.’ यह अन्तिम वाक्य सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये, बदन में सनसनी दौड़ने लगी. हे ईश्वर, यह किस भुतहा स्थान पर आ गया हूं मैं? क्या मुझे आगे जाना चाहिये या यहीं से वापस लौट जाना चाहिये. दिल कहता था कि आगे जाकर इस व्यक्ति की मदद करूं जो गुहार लगा रहा है. दिमाग़ कहता था कि अगर गला कटा हुआ व्यक्ति बात कर रहा है तो निश्चित ही यह कोई प्रेत लीला है. उस दिन मुझे समझ में आया कि दिल की बात आदमी तभी सुनता है जब वह प्रेम में होता है अन्यथा दिमाग़ से ही काम लेता है.
मैं फ़ौरन वहां से वापस लौट पड़ा. लौटते वक़्त मुझे पूरे समय अहसास होता रहा कि अभी कोई पीछे से मेरी गर्दन दबोच लेगा. तेज़ तेज़ कदमों से चलता हुआ मैं जब मेन रोड पर पहुंचा तो मेरी बाइक के पास एक आदमी खड़ा हुआ था. मुझे देख कर वह बोला, “बाबूजी, आप इधर कहां से आ रहे हैं ?” मैंने कहा, “कुछ नहीं मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई दे रही थीं, वही देखने गया था कि कौन पुकार रहा है कि मेरी मदद करो.” उस आदमी ने ग़ौर से मेरा चेहरा देखा और हंस कर बोला, “तो बाबूजी आप भी उन लोगों में से हो जो अपने काम से काम नहीं रखते.” मैंने कहा, “अब जो भी कहो, इतनी दर्द भरी आवाज़ सुन कर मैं ख़ुद पर काबू नहीं रख सकता था. अगर मैं किसी की मदद कर सकता हूं तो ज़रूर करूंगा. और तुम हंस क्यों रहे हो ?” अगर यह कोई प्रेतलीला न होती तो मैं ज़रूर ही उस की मदद करता लेकिन वहां तो कोई गला कटा हुआ आदमी है जो किसी की जान लेने पर तुला हुआ है.”
वह आदमी बोला, “आप ज़रा पीछे मुड़ कर देखिये कि क्या फिर कोई आवाज़ आती है?” मैंने गर्दन घुमाई और मेरे कानों में चीख़ती हुई सी आवाज़ आयी, “मार डाला, हाय मार डाला.” मैं थरथरा उठा और वापस पलटा तो वह आदमी मुस्करा रहा था. मैं डर के मारे कांपने लगा और अपनी बाइक पर बैठ कर चाबी घुमाई. उस आदमी ने मेरी बाइक के हैंडल पर हाथ रख दिया और बोला, “बाबूजी, राज़ समझे बिना चले जाओगे क्या ? और इतना कह कर ज़ोरों से हंसा. मैं ठिठक कर बोला, “तुमको पता है क्या कि यह कैसी लीला है?” वह बोला, “लीजिये, जिसकी लीला, वही न जानेगा ? अरे यह मैं ही तो हूं.” मैं सन्नाटे में आ गया. क्या यह व्यक्ति कोई प्रेत है ? मैंने बाइक में किक मारनी चाही मगर घबराहट में मेरा पैर फिसल गया. उस व्यक्ति ने मुझसे कहा, “आप इतनी देर रुके हैं तो दो मिनट और सही. मेरी बात सुन लीजिये फिर ख़ुद ही फ़ैसला कीजियेगा. अब मैने ध्यान दिया कि जब से मैं इस आदमी से बात कर रहा था, मुझे सिर्फ़ एक ही बार आवाज़ सुनाई दी थी जब उसने मुझे पीछे देखने को कहा था. मैंने उस से कहा, “बोलो, क्या कहना चाहते हो ?” वह बोला, “एक बार फिर से पीछे देखिये तो बिना डरे.” मैं जैसे ही पीछे मुड़ा, हवा में गूंजती हुई आवाज़ आयी, “इतना ही डरते हो तो झाड़ियों के बीच क्यों घुसे जा रहे थे ? पीछे मुड़ जाओ अब.” मैं फिर पलटा तो देखा उस व्यक्ति के चेहरे पर बड़ी सौम्य मुस्कान थी. वह बोला, “अब भी नहीं समझे आप?” मैंने कहा, “नहीं.” अब हवा में गूंजती हुई तेज़ आवाज़ आयी, “तो कब समझेंगे मालिक आप?” वह आदमी बदस्तूर मुस्करा रहा था. मेरे चेहरे पर डर, आतंक और आश्चर्य के मिले जुले भाव देख कर वह सधे हुए लहजे में बोला, “अब मैं आपको बताता हूं सच्चाई. देखिये मैं एक आवाज़ का कलाकार हूं. लोगों की आवाज़ की नकल करना मेरा बचपन से शौक रहा है. धीरे धीरे मैंने अपनी इस कला को बढ़ाना शुरु किया और अब मैं न सिर्फ़ किसी की भी आवाज़ की नकल उतार सकता हूं बल्कि अपना मुंह बन्द कर के भी इस तरह बोल सकता हूं कि आवाज़ किसी अन्य दिशा से आती हुई सुनाई दे. सुनिये, मैं हवा में आपकी आवाज़ सुनाता हूं.” और मुझे हवा में तैरती अपनी आवाज़ सुनाई दी, “यह कैसी प्रेतलीला है?” मेरा सारा डर, घबराहट और भ्रम दूर हो गया. मैंने उस आदमी की कला की जी भर कर तारीफ़ की, उसका नाम पूछा, फ़ोन नम्बर लिया और उससे कहा, “आप तो इतने बड़े कलाकार हैं, यहां गांव में क्या कर रहे हैं ?” उसने कहा, “पास में ही मेरा गांव है और मैं तो बम्बई में फ़िल्मों में और स्टेज शोज़ में अपनी कला का प्रदर्शन करता हूं. अभी पिता जी से मिलने आया हुआ हूं. गांव से निकलकर यहां सन्नाटे में झाड़ियों में बैठा एक शो की प्रैक्टिस कर रहा था तब तक आप की ‘लीला’ चालू हो गयी. हम दोनों बहुत हंसे और मैं उस से विदा ले कर चल पड़ा. घर आकर मैंने इस कला के बारे में नेट पर देखना शुरु किया तो मुझे पता चला कि ऐसे कलाकार को वेन्ट्रिलोक्विस्ट (Ventriloquist) कहते हैं और यह बहुत ज़्यादा अभ्यास मांगता है. मैंने भी बड़ी कोशिश की पर मैं बिलकुल भी ऐसा न कर पाया. आप भी ज़रा ट्राई कर के देखियेगा. क्या पता आपके अन्दर भी ए Ventriloquist छुपा हुआ हो.
उत्तम सिंह
सहायक संपादक (एडिटोरियल)
Sub-Editor

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