ऊँ नम:, ऊँ नम:, ऊँ नम:!
परम श्रद्धेय आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज जी, श्रवण बेलागोला के मठाधीश स्वामी चारुकीर्ति जी, मेरे सहयोगी गजेंद्र सिंह शेखावत जी, संसद में मेरे मित्र भाई नवीन जैन जी, भगवान महावीर अहिंसा भारती ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रियंक जैन जी, संघ मित्रता जैन जी, ट्रस्टी पीयूष जैन जी, अन्य सभी महानुभाव, संतजन, देवियों और सज्जन, जय जिनेंद्र!
आज हम सब भारत की अध्यात्म परंपरा के एक महत्वपूर्ण अवसर के साक्षी बन रहे हैं। पूज्य आचार्य श्री विद्यानन्द जी मुनि, उनकी जन्मशताब्दी का यह पुण्यपर्व, उनकी अमर प्रेरणाओं से प्रेरित होकर यह कार्यक्रम, एक अलौकिक वातावरण का निर्माण हम प्रेरक प्रेरणा कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में यहां उपस्थित लोगों के साथ ही, लाखों लोग ऑनलाइन व्यवस्था के माध्यम से भी हमारे साथ जुड़े हुए हैं। मैं आप सभी का आह्वान करता हूं, आप सभी के लिए यहां आने का अवसर प्रदान करता हूं।
,
आज का ये दिन एक और वजह से बहुत खास है। 28 जून, यानी 1987 में आज की तारीख में ही आचार्य श्री विद्यानंद जी मुनि को आचार्य पद की डिग्री प्राप्त हुई थी। और वो सिर्फ एक सम्मान नहीं था, बल्कि जैन परंपरा को विचार, संयम और करुणा से जोड़ने वाली एक पवित्र धारा प्रवाहित हुई। आज जब हम उनकी जन्म शताब्दी मना रहे हैं, तब यह तारीख हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाती है। मैं इस अवसर पर आचार्य श्री विद्यानंद जी मुनि के चरणों में नमन करता हूं। हम सभी को सदैव आशीर्वाद देते रहें, यही प्रार्थना करता हूं।
,
श्री विद्यानंद जी मुनिराज की जन्म शताब्दी का यह आयोजन, ये कोई साधारण कार्यक्रम नहीं है। इसमें एक युग की स्मृति है, एक तपस्वी जीवन की झलक है। आज इस ऐतिहासिक अवसर को अमर बनाने के लिए विशेष स्मृति सिक्के, डाक टिकट जारी किये गये हैं। मैं इसके लिए सभी देशवासियों को भी नमस्कार करता हूं। मैं विशेष रूप से आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी का अभिनंदन करता हूं, उन्हें प्रणाम करता हूं। आपके सुझाव में आज लाखों साझेदार पूज्य गुरुदेव के पद पर आगे बढ़ रहे हैं। आज इस अवसर पर आपने मुझसे ‘धर्म गुरु’ की उपाधि का जो निर्णय लिया है, मैं खुद को इसके योग्य नहीं मानता, बल्कि हमारा संस्कार है कि हमें संतों से जो कुछ मिलता है, उसे प्रसाद समझकर स्वीकार किया जाता है। और इसलिए, मैं आपके इस प्रसाद को नकारता हूं, और मां भारती के चरणों में समर्पित करता हूं।
,
जिस दिव्य आत्मा की वाणी को, उनके वचनों को, हम जीवन भर गुरु वाक्य सिखाते हैं, हमारे हृदय तार रूप से जुड़ रहे हैं, उनके बारे में कुछ भी बोलते हैं, हमें प्रेरित कर देते हैं। मैं अभी भी सोच रहा हूं कि श्रीनंद जी मुनि विद्याराज के बारे में डोना की जगह काश हमें आज भी उनके श्रवण की प्रतिभा के बारे में बताएं। ऐसी महान विभूति की जीवन यात्रा के बोल आसान नहीं हैं। 22 अप्रैल, 1925 को कर्नाटक की पुण्यभूमि पर उनका अवतरण हुआ। आध्यात्मिक नाम मिला विद्यानंद औऱ उनका जीवन, विद्या औऱ आनंद का अनोखा संगम रहा। उनकी वाणी में गंभीर ज्ञान था, लेकिन शब्द इतना सरल कि हर कोई समझ सके। 150 से अधिक ग्रंथों के ग्रंथ, हजारों किलोमीटर की पदयात्रा, लाखों युवाओं को संयम और संस्कृति से जोड़ने का महायज्ञ, आचार्य श्री विद्यानंद जी मुनिराज युगपुरुष थे, युगदृष्टा थे। ये मेरा सौभाग्य है कि, मुझे उनके आध्यात्मिक आहा को प्रत्यक्ष अनुभव करने का अवसर मिल रहा है। समय-समय पर वो मुझे अपना मार्गदर्शन भी देते रहे, और उनका आशीर्वाद हमेशा मिलता रहा। आज उनकी जन्मशताब्दी का ये मंच, मैं यहां भी उनके उसी प्यार और अपनेपन को महसूस कर रहा हूं।
,
हमारा भारत विश्व की सबसे प्राचीन जीवंत सभ्यता है। हम हजारों वर्षों से अमर हैं, क्योंकि हमारे विचार अमर हैं, हमारा विचार अमर है, हमारा दर्शन अमर है। और, इस दर्शन के स्रोत हैं- हमारे ऋषि, मुनि, महर्षि, संत और आचार्य! आचार्य श्री विद्यानंद जी मुनिराज भारत की इसी प्राचीन परंपरा के आधुनिक प्रकाश स्तंभ रहे हैं। किस-किस विषय पर उनकी विशेषज्ञता थी। जहाँ-जहाँ उन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स की प्राप्ति हुई थी। उनकी आध्यात्मिक प्रखरता, उनका ज्ञान, कन्नड़, मराठी, संस्कृत और प्राकृत जैसी भाषाएं उनकी पकड़ पर हैं और अभी भी जैसे पूज्य महाराज जी ने कहा था, 18 समुद्रों का ज्ञान, उनके द्वारा दिया गया साहित्य और धर्म की सेवा, उनकी साधना, राष्ट्रसेवा के लिए उनका कर्तव्य, जीवन का ऐसा कौन सा उद्देश्य है, जिसमें वे आदर्शों के योग न छुए हों! वो एक महान संगीतज्ञ भी थे, वो एक प्रखर राष्ट्रभक्त और स्वतन्त्रता सेनानी भी थे और वो एक अनूठे वीतराग दिगम्बर मुनि भी थे। वो विद्या और ज्ञान के भंडार भी थे, और वो आध्यात्मिक आनंद के स्रोत भी थे। मैं पवित्र हूँ कि, पवित्र सुन्दर आचार्य आचार्य श्री विद्यानंद मुनिराज बनने की यात्रा, ये सामान्य मानव से महामानव बनने की यात्रा है। इस बात की प्रेरणा यह है कि, हमारा भविष्य हमारे वर्तमान जीवन की सीमाओं में बंधा नहीं है। हमारा भविष्य इस बात से तय होता है कि, हमारी दिशा क्या है, हमारा लक्ष्य क्या है, और हमारा संकल्प क्या है।
,
आचार्य श्री विद्यानन्द मुनिराज ने अपने जीवन को केवल साधना तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जीवन को समाज और संस्कृति के पुनर्निर्माण का माध्यम बनाया। प्राकृत भवन और अनेक शोधार्थी की स्थापना करके उन्होंने ज्ञान की दीपशिखा को नई नींद तक पहुंचाया। उन्होंने जैन इतिहास को भी अपनी सही पहचान स्थिति बताया। ‘जैन दर्शन’ और ‘अनेकांतवाद’ जैसे मूल सिद्धांतों की रचनाएं कर विचारों को गहराई, व्यापकता और समरसता दी। पौराणिक कथाओं के जीर्णोद्धार से लेकर बच्चों की शिक्षा और सामाजिक कल्याण तक, उनका हर प्रयास आत्म कल्याण से लेकर लोकमंगल तक जा रहा है।
,
आचार्य विद्यानन्द जी महाराज कहते थे- जीवन धर्ममय तभी हो सकता है जब जीवन स्वयं सेवा बन जाये। उनका ये विचार जैन दर्शन की मूल भावना से ओत-प्रोत है। ये विचार है भारत की ओपन से बाहर। भारत सेवा प्रधान देश है। भारत मानव प्रधान देश है। दुनिया में जब हजारों वर्षों से हिंसा को शांत करने के प्रयास हो रहे थे, तब भारत ने दुनिया को अहिंसा की शक्ति का बोध कराया। हमने मानवता की सेवा की भावना को सर्वोपरि रखा।
,
हमारा सेवा भाव बिना शर्त है, स्वार्थ से है और परमार्थ से प्रेरित है। सिद्धांत सिद्धांत को लेकर आज हम देश में भी आदर्शों से प्रेरणा लेकर के काम कर रहे हैं। आवास योजना हो, जल जीवन मिशन हो, आयुष्मान भारत योजना हो, लोगों को मुफ्त अनाज मिले, ऐसी हर योजना में समाज के अंतिम संस्कार पर व्यक्ति की प्रति सेवा भाव है। हम इन शर्तों में पवित्रता तक पहुंच की भावना से काम कर रहे हैं। यानी कोई भी पीछे ना छूटे, सब साथ-साथ सिलिकॉन, सब मिलकर आगे बढ़ें, यही आचार्य श्री विद्यानंद मुनिराज जी की प्रेरणा है और यही हमारा संकल्प है।
,
हमारे तीर्थंकरों की, हमारे मुनियों और आचार्यों की वाणी, उनकी शिक्षाएँ, हर काल में समान ही होती हैं। और विशेष रूप से, आज जैन धर्म के सिद्धांत, पांच महाव्रत, अत्याधिक व्रत, त्रिरत्न, षट आवश्यक हैं, ये आज से पहले भी कहीं महत्वपूर्ण हो गए हैं। और हम जानते हैं, हर युग में सनातन शिक्षाओं को भी सामान्य मानवी के साथ आसानी से बनाना आवश्यक है। आचार्य श्री विद्यानन्द मुनिराज का जीवन, उनके कार्य, इस दिशा में भी समर्पित किये जा रहे हैं। उन्होंने ‘वचनामृत’ आंदोलन का संचालन किया, जिसमें जैन ग्रंथों को आमचल की भाषा में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने संगीत के माध्यम से धर्म के गहन विषयों को सरल से सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाया। अब हम अमर भये न मरेंगे, हम अमर भये न मरेंगे, तन कारण मिथ्यात् दियो तज, क्यों करि देह धरेंगे, आचार्य श्री के ऐसे कितने ही भजन हैं, जिसमें उन्होंने अध्यात्म की मोतियों को मिलाकर हम सबके लिए एक पुण्य माला बनाई है। अब हम अमर भये न मरेंगे, अमरता में ये सहज विश्वास, अनंत की ओर देखने का ये हाल, ये भारतीय अध्यात्म और संस्कृति को बहुत ही खास बनाता है।
,
आचार्य श्री विद्यानंद मुनिराज की जन्मशताब्दी का इस वर्ष, हमें निरंतर प्रेरणा मिलती है। हमें आचार्य श्री के आध्यात्मिक उपदेशों को अपने जीवन में स्थापित करना तो है ही, समाज और राष्ट्र के लिए उनके कार्यों को हम आगे बढ़ाते हैं, यह भी हमारा दायित्व है। आप सभी जानते हैं कि आचार्य श्री विद्यानंद मुनिराज ने अपने भजनों के माध्यम से प्राचीन प्राकृत भाषा का सबसे बड़ा पुनरुद्धार किया था। प्राकृत भारत की सबसे पुरानी समुद्र तट में से एक है। ये भगवान महावीर के उपदेशों की भाषा है। इसी भाषा में मूल ‘जैन आगम’ रचा गया। लेकिन, अपनी संस्कृति की अनदेखी करने वालों के कारण ये भाषा सामान्य प्रयोग से बाहर होने लगी थी। हमने श्री संतों जैसे आचार्य के लिए देश का प्रयास किया। पिछले साल अक्टूबर में हमारी सरकार ने प्राकृत को ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा दिया था। और अभी कुछ आचार्य जी ने अपना ज़िक्र भी किया। हम भारत की प्राचीन पाण्डुलिपियों को डिजिटल बनाने का अभियान भी चला रहे हैं। इसमें बहुत बड़ी मात्रा में जैन धर्मग्रंथों और आचार्यों से जुड़ी पाठ्यपुस्तकें शामिल हैं। और अभी जैसा आपने कहा था 50,000 से अधिक नमूनों के विषय में, हमारे सचिव सर यहां बैठे हैं, वो आपके पीछे मिलेंगे। हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। अब हम शिक्षा में भी मातृभाषा को बढ़ावा देते हैं। और वैसे, मैंने लाल किले से कहा है, हमें देश को गुलामी की प्राप्ति से मुक्ति दिलानी है। हमें विकास और विरासत को एक साथ लेकर आगे बढ़ना है। इसी संकल्प को केंद्र में रखते हुए, हम भारत के सांस्कृतिक स्थानों का, तीर्थस्थानों का भी विकास कर रहे हैं। 2024 में हमारी सरकार ने भगवान महावीर के दो हजार पांच सौ तीर्थयात्रियों के निर्वाण महोत्सव का व्यापक स्तर पर आयोजन किया था। इस समारोह में आचार्य श्री विद्यानंद मुनि जी की प्रेरणा शामिल थी। इसमें आचार्य श्री प्राज्ञ सागर जी जैसे संतों का आशीर्वाद शामिल था। आने वाले समय में, अपनी सांस्कृतिक हरियाली और उसे और समृद्ध बनाने के लिए ऐसे ही और बड़े पैमाने पर कार्यक्रम हमें जारी रखना है। इसी कार्यक्रम की तरह ही, हमारा ये सारा प्रयास जनभागीदारी की भावना से होगा, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास’ ये मंत्र होगा।
,
आज मैं आपके बीच आया हूं तो नवकार महामंत्र दिवस की स्मृति भी स्वाभाविक है। उस दिन हमने 9 संकल्पों की भी बात की थी। मुझे ख़ुशी है कि बड़ी संख्या में देशवासी उन संकल्पों को पूरा करने में लगे हैं। आचार्य श्री विद्यानन्द मुनिराज से हमें जो दिशा निर्देश है, वो इन 9 संकल्पों को और स्थान देते हैं। इसलिए, आज इस अवसर पर, मैं उन 9 संकल्पों को फिर से आपके साथ साझा करना चाहता हूं। पहला संकल्प, पानी से मुक्ति का है। एक-एक बूंद पानी की कीमत समझ आती है। ये हमारी जिम्मेदारी भी है और धरती मां की प्रति फर्ज भी। दूसरा संकल्प, एक पेड़ की माँ का नाम। हर कोई अपनी माँ के नाम एक पेड़। उसे वैसे ही सींचे, जैसी माँ हमें सिखाती रहती है। हर पेड़ माँ का आशीर्वाद बने। तीसरा संकल्प,स्वतंत्रता का। साफ-सफाई सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, ये अंदर का अहिंसा है। हर गली, हर माहोल, हर शहर स्वच्छ हो, हर किसी को इस काम में छोड़ना है। चौथा संकल्प, लोकल के लिए वोकल। जिस चीज में कोई भी भारतीय का व्यंजन हो, जिसमें मिट्टी की चटनी हो, वही खरीदनी है। और आप में से ज्यादातर लोग व्यापार Business में रहते हैं। तुम्हें मेरी विशेष जिम्मेदारी है। अगर हम व्यापार में हैं, तो हमें कॉलेज के बनाए सामान को ही प्राथमिकता से बेचना है। सिर्फ माइक्रोवेव नहीं देखना है। और शिक्षकों को भी प्रेरित करना है। पंचवाँ संकल्प देश का दर्शन। दुनिया देखो, जरूर देखो। लेकिन अपने भारत को जानें, समझें, महसूस करें। छठा संकल्प, नाइचूरल फॉर्मिंग का विरोध। हमें धरती माँ को जहर से मुक्त करना है। खेती को दस्तावेज़ से दूर ले जाना है। गाँव-गाँव में प्राकृतिक खेती की बात है। ये हमारे पूज्य महाराज साहब साहेब न बोले, तीसरी से बात नहीं सनातन, हमें भी तो धरती मां की रक्षा करनी होगी। सातवां संकल्प, कार्मिक लाइफस्टाइल का। जो सांकेतिक, सांकेतिक। भारत की पारंपरिक थाली में श्रीमान हो, हमारे भोजन में कम से कम 10 प्रतिशत तेल भी कम करना है। इससे मोटापा भी आएगा और जीवन में ऊर्जा भी आएगी। आठवाँ संकल्प, योग और खेल का। खेल और योग, दोनों को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना है। नव संकल्प, गरीबों की मदद का। किसी गरीब का हाथ पकड़ना, उसे गरीबी से दूर रखने में मदद करना, यही असली सेवा है। मुझ पर विश्वास करें, हम इन 9 संकल्पों पर काम करेंगे, तो श्री विद्यानंद जी मुनिराज जी को और उनकी शिक्षाओं को भी सबसे ज्यादा बढ़ावा देंगे।
,
भारत की ओर से, हमारे साधू-संतों को लेकर हमारे देश में अमृतकाल के दर्शन हुए हैं। आज 140 करोड़ देशवासी देश के अमृत संकल्पों को पूरा करते हुए विकसित भारत के निर्माण में लगे हैं। विकसित भारत के इस सपने का मतलब है- हर देशवासी के सपने को पूरा करना! यही आचार्य श्री विद्यानंद जी मुनिराज जी ने हमें प्रेरणा दी है। उनके दिखाये प्रेरणा पथ पर चलना, उनकी शिक्षाओं को स्थापित करना, राष्ट्र निर्माण को अपने जीवन का पहला ध्यान बनाना, ये हम जिम्मेदार हैं। मुझ पर विश्वास करें, आज यह पवित्र अवसर की ऊर्जा हमारे इन संकल्पों को बढ़ावा देगी। और अभी प्रज्ञ सागर महाराज साहब ने कहा कि जो हमें कहेगा, अरे मैं जैनियों के कार्यक्रम में हूं, अहिंसावादियों के बीच हूं और अभी तो आधा वाक्य बोला हूं और तुमने पूरा कर दिया। देखने का मतलब यह है कि अच्छे शब्दों में यह नहीं कहा गया है, शायद आप ऑपरेशन सिन्दूर को आशीर्वाद दे रहे थे। आप सबका प्यार, राज आपका आशीर्वाद, इन भावनाओं के साथ, मैं एक बार फिर आचार्य श्री विद्यानंद जी मुनि को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं। आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद। जय जिनेन्द्र !!!









