श्री भूपेंद्र यादव ने आईएफएस अधिकारियों से आग्रह किया कि वे पारंपरिक नियामक कार्यों से आगे बढ़कर सतत विकास के नेता, नवप्रवर्तक और सूत्रधार बनें।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री (ईएफसीसी) श्री भूपेंद्र यादव ने आज नई दिल्ली में भारतीय वन सेवा के मध्य-करियर प्रशिक्षण (एमसीटी) चरण-III (19) के प्रतिभागियों से बातचीत की। इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में सचिव (ईएफसीसी) श्री नरेंद्र भूषण; महानिदेशक (वन) एवं विशेष सचिव (ईएफसीसी) श्री संतोष तिवारी; एडीजी (वन्यजीव), ईएफसीसी, श्री रमेश पांडे; निदेशक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (आईएनजीएफए) श्री राजेंद्र प्रसाद खजूरिया और मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।

विभिन्न राज्य कैडरों के उपस्थित भारतीय सुरक्षा बल (आईएफएस) अधिकारियों को संबोधित करते हुए, श्री यादव ने भारत के वनों, वन्यजीवों और पारिस्थितिक विरासत की रक्षा में उनके योगदान को सराहा। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण, वन और वृक्ष आवरण में वृद्धि, कार्बन पृथक्करण, वन/आर्द्रभूमि संरक्षण और नागरिक सहभागिता पहलों जैसे ‘एक पेड़ मां के नाम’, मिष्टी, अरावली ग्रीन वॉल और नगर वन योजना के माध्यम से भूदृश्य बहाली में भारत की प्रगति पर प्रकाश डाला। मंत्री ने इस बात पर बल दिया कि ‘विकसित भारत@2047’ के दृष्टिकोण में आर्थिक विकास को पारिस्थितिक सुरक्षा के साथ एकीकृत करना आवश्यक है। उन्होंने मानव-वन्यजीव संघर्ष, वन अग्नि, जलवायु परिवर्तन और विकास तथा संरक्षण के बीच संतुलन को प्रमुख चुनौतियों के रूप में पहचाना, जिनके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक भागीदारी की आवश्यकता है।
मंत्री जी ने कहा कि भारत भाग्यशाली है कि यहाँ जलवायु, पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता की व्यापक विविधता पाई जाती है। उन्होंने कहा कि एक आईएफएस अधिकारी को जमीनी स्तर पर वन और वन्यजीव संरक्षण में कुशलतापूर्वक नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए अनुकूलनशील होना चाहिए। उन्होंने बताया कि जैव संसाधन इस ग्रह के सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक संसाधन हैं, इसलिए अधिकारियों को जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के अनुभव के साथ-साथ मंत्रालय स्तर पर नीति निर्माण का व्यापक अनुभव भी दिया जा रहा है। मंत्री जी ने अधिकारियों को अपने क्षेत्र की चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया।
भारतीय वन सेवा की बदलती भूमिका पर प्रकाश डालते हुए, श्री यादव ने अधिकारियों से आग्रह किया कि वे पारंपरिक नियामक कार्यों से आगे बढ़कर सतत विकास के नेता, नवप्रवर्तक और सूत्रधार बनें। उन्होंने जीआईएस, रिमोट सेंसिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित उभरती प्रौद्योगिकियों के महत्व पर बल दिया, साथ ही पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करते हुए निरंतर क्षमता निर्माण और सामुदायिक सहभागिता पर भी बल दिया। मंत्री ने अधिकारियों से संस्थानों को मजबूत करने, कुशल निर्णय लेने और वन प्रबंधन योजनाएँ तैयार करने के लिए नवीन दृष्टिकोण अपनाने और भारत के पारिस्थितिक भविष्य की रक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया।

एमसीटी कार्यक्रम 2026
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (IGNFA) द्वारा 12 अक्टूबर से 6 नवंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा मध्य-करियर प्रशिक्षण चरण-III (19) कार्यक्रम, 7-9 वर्ष की सेवा वाले IFS अधिकारियों के लिए डिज़ाइन किया गया है। 18 कैडरों के 68 प्रतिभागी विविध क्षेत्र और नीतिगत अनुभव रखते हैं, और उनकी व्यावसायिक रुचियां वन्यजीव संरक्षण शासन, जलवायु-लचीली वानिकी, पर्यावास बहाली, भूदृश्य बहाली और पर्यावरण नीति कार्यान्वयन तक फैली हुई हैं।
इस कार्यक्रम को नेतृत्व, रणनीतिक नीति क्रियान्वयन और जमीनी स्तर पर वन प्रशासन को मजबूत करने के लिए संरचित किया गया है, साथ ही उभरती प्रौद्योगिकियों और समकालीन दृष्टिकोणों को भी इसमें शामिल किया गया है। कार्यक्रम के अंतर्गत, लाइन मिनिस्ट्री मॉड्यूल के तहत अधिकारियों को प्रमुख केंद्रीय मंत्रालयों और संगठनों से परिचित कराया जाएगा ताकि अंतर-क्षेत्रीय संबंधों और नीतिगत ढांचों की समझ को बढ़ाया जा सके। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की विषयगत यात्राओं में वन्यजीव प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण पर्यटन और समुदाय आधारित वन प्रबंधन में सर्वोत्तम प्रथाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
प्रबंधन मॉड्यूल नेतृत्व और निर्णय लेने, मानव संसाधन और वित्तीय प्रबंधन, वन संपदा के शासन, वार्ता और विवाद समाधान, परिवर्तन प्रबंधन, संचार और नैतिक नेतृत्व पर केंद्रित होगा। अंत में, वानिकी मॉड्यूल पर्यावरण संबंधी समझौतों, वानिकी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल परिवर्तन, राष्ट्रीय वन्यजीव नेतृत्व, जैव विविधता शासन, जलवायु वित्त, वन अधिकार अधिनियम (FRA) के मुद्दे, जलसंभर प्रबंधन, हाल ही में हुए FCA संशोधनों और मानव-वन्यजीव संघर्ष सहित उभरते मुद्दों पर चर्चा करेगा।

